उदास द्विपदियाँ -26 जनवरी पर

जिस दिन खादी कलफ धुलती है।
सजती है लॉंड्री बेवजह खुलती है।

फुनगियों को यूँ तरस से न देखो,
उन पर चिड़िया चहक फुदकती है।

बहुत है गुमाँ तेरी यारी पर दोस्त,
सहमता हूँ जो तुम्हारी नज़र झुकती है।

ये अक्षर हैं जिनमें सफाई नहीं
आँखों में किरकिर नज़र फुँकती है।

गाहे बगाहे जो हम गला फाड़ते हैं,
चीखों से साँकल चटक खुलती है।

रसूख के पहिए जालिम जोर जानी,
जब चलती है गाड़ी डगर खुदती है।

आईन है बुलन्द और छाई है मन्दी,
महफिल-ए-वाहवाही ग़जब सजती है।

साठ वर्षों से पाले भरम हैं गाफिल,
जो गाली भी हमको बहर लगती है।

सय्याद घूमें पाए तमगे सजाए
आज बकरे की माँ कहर दिखती है।

पथराई जहीनी हर हर्फ खूब जाँचे,
ग़ुमशुदा तलाश हर कदम रुकती है।

खूब बाँधी हाकिम ने आँखों पे पट्टी,
बाँच लेते हैं अर्जी कलम रुकती है।

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21 thoughts on “उदास द्विपदियाँ -26 जनवरी पर

  1. गाहे बगाहे जो हम गला फाड़ते हैं,चीखों से साँकल चटक खुलती है।पूरी की पूरी रचना किसी अनिंदनीय सुंदरी की भांति लगी है..आपकी लेखनी की बानगी देखते ही बनती हैं…उपर्युक्त पंक्तियों की बात ही क्या कहें…साँकल वास्तव में चटक खुली हैं…मन की..!!

  2. साठ वर्षों से पाले भरम हैं गाफिल,जो गाली भी हमको बहर दिखती है।गाहे बगाहे जो हम गला फाड़ते हैं,चीखों से साँकल चटक खुलती है।वाह क्या बात है साठ साल के भर्, बेहतरीन रचना नये प्रतीकों के साथ्। गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ.

  3. गणतंत्र के साठ साल पूरे होने पर यही कामना कि राष्ट्रीय एकता का पैगाम दूर तलक तक पहुंचे और विकास की एक किरण आखिरी पायदान पर खड़े शख्स के चेहरे पर भी मुस्कान लाए…जय हिंद…

  4. बहुत बढ़िया गिरिजेश. हर पद एक से बढ़कर एक फिर भी निम्न खंड तो ख़ास ही है:आईन है बुलन्द और छाई है मन्दी,महफिल-ए-वाहवाही ग़जब सजती है।साठ वर्षों से पाले भरम हैं गाफिल,जो गाली भी हमको बहर दिखती है।सय्याद घूमें पाए तमगे सजाएआज बकरे की माँ कहर दिखती है।पथराई जहीनी हर हर्फ खूब जाँचे,ग़ुमशुदा तलाश हर कदम रुकती है।

  5. रसूख के पहिए जालिम जोर जानीजब चलती है गाड़ी डगर खुदती हैखूब बांधी हाकिम ने आखों पे पट्टीबांच लेते है अर्जी कलम रुकती हैयथार्थ उकेरती, बेहतर झकास द्विपदियां…

  6. ग़ज़ल पहली बार आपकी ब्लॉग पर पढ़ रहा हूँ ………. आपको तो महारत है हर तरह की रचनाओं में …….. सच है ….. कवि हर शिल्प अपना सकता है ……. आपकी ग़ज़ल का हर शेर नये आदाज़ लिए है ………

  7. सठियाया गणतंत्र…हा हा!"उदास द्विपदियां" इस शीर्षक ने मन मोहा है राव साब।अच्छी पंक्तियां बुनी हैं सर जी…नया अंदाज!! कहीं-कहीं पढ़ते समय लय भटक रहा है\ शाय्द कमी मेरे पढ़ने में हो…

  8. अंदाज भाया । गज़ल के नक्शे का पता भी लग गया आपको ? सोच रहा हूँ , आप लय में अटके हैं (इस गज़ल में तो भटके हैं, जैसा गौतम जी ने फरमाया )। फिर यह भी लिख गये – "साठ वर्षों से पाले भरम हैं गाफिल,जो गाली भी हमको बहर लगती है।"

  9. अच्छी गज़ल …नायब शेर ..फुनगियों को यूँ तरस से न देखो,उन पर चिड़िया चहक फुदकती है।खूब बाँधी हाकिम ने आँखों पे पट्टी,बाँच लेते हैं अर्जी कलम रुकती है।..वाह क्या बात है!

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