युगनद्ध – 2

युगनद्ध – 1

सज गई
फिर 
उड़ी आवर्तों में 
सिहरी, लहकी
खुली बहकी
लहर लहर
नाच उठी।

सहलाया
दुलराया
सीने से लगा
बहकाया
दे सहारा घुमाया
आनन्द आवर्तों में।


गूँज उठी किलकारी 
बच्चों की।
युगनद्ध जो हुए थे
पतंग और पवन।

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20 thoughts on “युगनद्ध – 2

  1. आवर्त शब्द ने ध्यान खींचा है बंधु। अब तक केमिस्ट्री के केवल आवर्त सारणी से ही परिचय था, नहीं जानता था कविता में इतना सुंदर आवर्त शब्द का प्रयोग हो सकता है। बहुत खूब।

  2. जम गईफिर बढ़ी आवर्तों में बरसी, चहकीरसभरी फुहारभिगो गयीमन का पोर-पोर।मन भायाहरषायादिल से लगायामुस्कायाबारम्बार डुबाया मन कोआनन्द आवर्तों में।गूँज उठी जयजयकार कविता के भक्तों की युगनद्ध जो हुए थेप्रतिभा और शब्द।

  3. नचाती, दुलराती, बहकाती सी कविता…अरे !! मन पतंग हुआ जाता है…आनंद के आवर्तों में….सम्हल जाए तो अच्छा है ..मांझा जो कुछ कम हो गया है….:):)क्या लिखते हैं बाप रे…..!!

  4. सज गईफिर उड़ी आवर्तों में सिहरी, लहकीखुली बहकीलहर लहरनाच उठी।सहलायादुलरायासीने से लगाबहकायादे सहारा घुमायाआनन्द आवर्तों में।एज यूजुअल , इसमे आपकी कलाकारी दर्शनीय है ! 🙂

  5. पिछली कई कविताओं में आई टिप्पणियाँ देख कर सोच रहा हूँ, संक्रामक हैं आप अपनी कविताई के ढंग में । ढंग से टिप्पणी करने वाले भी आपके प्रभाव में बेढंगी (?) टिप्पणियाँ करने लग गए हैं । एक नयी धारा ! अब अरविन्द जी भी !

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