इंटीग्रेसन की किताब

जब मन था हैराँ, किसी के यूँ ही चले जाने से
जब मन था हैराँ, ‘मित्र’ के ‘किसी’ हो जाने से
मेरे मित्र मैंने तुम्हें लिखने को कहा , कागज मेरा था।
कुछ न पूछा तुमने और बस रच गए !
एक तुम हो और एक वह थे – दोनों अपने !!
आज ‘हैं’ को ‘थे’ कहते कलेजा मुँह को आता है ।

सोचता हूँ कि एक खत लिखूँ तुम दोनों को
लिखावट हो बस – !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
विस्मयादिबोधक चिह्न – अविश्वास से भरे हुए।
दोनों खतों के इन चिह्न अर्थों में होगा कितना अंतर ! (एक और विस्मय !)
विस्मय में भी कितना अंतर !
शब्द निरर्थक हो चले थे, आज चिह्न भी हो गए !
यूँ दुअर्थी या बहुअर्थी हो जाना निरर्थक ही तो होता है।

जब सोचता हूँ कि अनिश्चय की उस बहस बेला से –
समझ ले तुम कितनी समझ रच गए, तो होता हूँ हैराँ
क्या निकटता की ऊष्मा दूर ही अच्छी होती है ?
साँसों के जीवन में सृष्टि ने दुर्गन्ध क्यों घोली?
क्या यह इंगित कराने को कि दूरी रहनी ही चाहिए ?
अधिक निकटता हमें एक दूसरे से दूर ही करती है
हम जान जाते हैं जो एक दूसरे की सीमाएँ !  
तुम्हारी भाषा में कहूँ तो योग के लिए सीमाएँ आवश्यक हैं
जब सीमाएँ होंगीं तो उनमें निम्न सीमा तो रहेगी ही
तुम उस उच्च सीमा को साधने को निम्न बन गए – सहर्ष !
तुमने दूरी को माप दे दिया – मेरे नाम के कागज पर रच कर।
इस माप को मैंने अपने औजारबक्से में रख लिया है
इसके दोनों छोरों पर मेरी सीमाएँ हैं।

मैं तुम दोनों का कृतज्ञ हूँ
उसने नहीं रचा मेरे कागज पर – उच्च सीमा।
तुमने रचा मेरे कागज पर – निम्न सीमा।

आज बहुत वर्षों के बाद मैंने अपनी इंटीग्रेसन की किताब खोली है ।

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9 thoughts on “इंटीग्रेसन की किताब

  1. जब मन था हैराँ, किसी के यूँ ही चले जाने से जब मन था हैराँ, 'मित्र' के 'किसी' हो जाने से पूरी कविता पढी, लेकिन मन है कि बार-बार इन्हीं पंक्तियों में उलझना चाहता है. बहुत सुन्दर.

  2. शब्द निरर्थक हो चले थे, आज चिह्न भी हो गए ! उसने नहीं रचा मेरे कागज पर – उच्च सीमा। तुमने रचा मेरे कागज पर – निम्न सीमा। क्या ये लिखूँ कि एक सुंदर सी बात पढ़ी है मैंने या यह कह दूँ कि 'जब शब्द, चिन्ह आदि सारे खोज रहे हों अपनी नवीन प्रासंगिकता तो फिर प्रति-अभिव्यक्ति के लिए कोई और माध्यम कहाँ से लाऊँ…'किसी अनन्य का महज 'किसी' हो जाना तो गहरे सालता है..ये आने वाला थे/था भी बहुत चुभता है पर यही शायद एरिअर है नए रिश्तों की बढ़ी हुई किश्तों का…!

  3. विस्मयादिबोधक? असल में ब्लॉगजगत में ?! का प्रयोग इतना अधिक करता हूं कि लगता है एक ही चिन्ह होना चाहिये – प्रश्नविस्मयादिबोधक! उसी में लिखा जाये खत!

  4. बिटिया ने आखिर पापा को लिमिटेड इंटीग्रेशन की किताब खुलवा ही दी.. बचपन में भी क्या इंटीग्रेशन के सवाल देखकर कवितायें ही सूझती थीं, या अब जाकर नॉस्टैल्जिक हुए जाय रहे हैं..?सेटेलाइट कम्यूनिकेशन की किताब खोले हुए हैं.. कतई जोर की नींद आ रही है। कविता का तो कोई स्कोपे नहीं बनता।

  5. क्या निकटता की ऊष्मा दूर ही अच्छी होती है ?साँसों के जीवन में सृष्टि ने दुर्गन्ध क्यों घोली?क्या यह इंगित कराने को कि दूरी रहनी ही चाहिए ?अधिक निकटता हमें एक दूसरे से दूर ही करती हैbahut ghri aur sachhi abhivykti.

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