तन धन …अकिञ्चन

यौवन
तन धन
सजे
सन सन।


शोर शोख 
बरजोर बार,
बार लेकिन 
कानों में कन कन 
तन धन
बजे घन घन।


आँख डोर 
बहकन
मन पतंग
तड़पन।
उठन शहर भर 
नीक लगत 
हवा पर
विचरण 
लहकन
तन धन 
बिखर छम थम।


लुनाई –
साँवरा बदन
कपोल लाल 
अधपके जामुन 
रस टपकन 
अधर मधुर 
मधु भर भर
कान लोर
लाल 
शरम रम रम 
तन धन
सिमट 
कहर बन शबनम।  


देह 
द्वै कुम्भ काम
दृग विचरें 
सप्तधाम 
कटि कुलीन 
नितम्ब पीन 
उतरे क्षीण
जैसे  
पश्चात मिलन 
पतली पीर 
सिमटन
तन धन 


धत्त अकिंचन !

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20 thoughts on “तन धन …अकिञ्चन

  1. मै इस बात को महसूस कर रहा हूँ कि हिन्दी मे यह एक नये शिल्प का उद्भव हो रहा है .. मै आपकी कविता को स्वर में पढ़ता हूँ और इसके पाठ से उत्पन्न ध्वनि से मुझे बहुत आनंद आता है ।

  2. यह टिप्पणी बड़के भैया से चैट के दौरान उनके निर्देश पर क्यों कि उनके सिस्टम से किसी कारण वश टिप्पणी नहीं हो पा रही है।______________________________________________एक एक शब्द जानलेवा हैं -कौन सी थाती लेकर लौटे हैं ! किस श्यामा नायिका ने मन मोहा और कहाँ ? मेरा भाई बिचारा गया काम से !सुन्दर नव प्रतीक विधान और कविता की ध्वन्यात्मकता भी -क्या कहने!और वह पीर रेख अवशेष !इतनी गहन संवेदना !ओह सारी फार यू डीयर !

  3. जैसा शरद जी ने कहा – एक नये कविता-शिल्प का उदय !इस भूख-अभाव की कविता के वक्त ऐसा सौन्दर्य-अनुभूति-भाव कैसे सँजोया । लाजवाब ! शब्दों के प्रयोग की अपरिमित सामर्थ्य है भईया आपमें । हिन्दी से इतर शब्दावली तो और भी विचित्र होकर सज गयी है इस रचना में ।निवृत्ति – प्रवृत्ति दोनों साध लिया है न भईया – प्रोफाइल मे बुद्ध, और कविता ….। गजब का विधान ।

  4. तड़पनकहना अधिकाधिकशब्द-गुंथन न खुल रहा,हर टिप्पणी सँजोबुन-बुनअभिव्यक्तन लिख डालूँ सौ-सौ…….चिन्तनकवि अदभुतकविता भीमन उन्मन है क्यों ना भईया-सा मन ……..धत्त अकिंचन !

  5. एक थे किलरू साव. महा कृपण. चाहतेे थे कि एक चम्मच शुद्ध घी से पूरे परिवार को पकवान का मजा आए. वैसे ही आपके एक-शब्द में तो पूरा महाकाव्य छिपा है. आपके पीपे से तेल की जगह शुद्ध घी टपक रहा है. इसी को कहते हैं वाह रे किस्मत का खेल, पढ़ें फारसी बेचैं तेल.

  6. अरे बाप रे!…क्या टिप्पणी करूँ?यह पढ़कर लगा जैसे जाकिर हुसेन तबले पर आपकी कविता के पाठ से संगत कर रहे हैं और हम एक-एक सुर, ताल और लय को पकड़ने-समझने की असफल कोशिश कर रहे हैं। बस ‘धन्‌… धन्‌…’ की आवाज अभी तक कानों में गूँज रही है।

  7. "लुनाई -साँवरा बदनकपोल लाल अधपके जामुन रस टपकन अधर मधुर मधु भर भरकान लोरलाल शरम रम रम तन धनसिमट कहर बन शबनम। " अधपके जामुन सम्मुख साकार हो गये ! ———————शब्दों में संगीत है ! इसके लिये आपको “घनानन्द” कहूंगा ! डरियेगा मत,:) 🙂 अच्छे कवि हैं ! संगीतात्मकता के लिये ही फ़ेमस हैं ! ———————- अनुभूति की जो भी डोमेन आप टच करते हैं उसे उसकी हाईरार्की के अन्तिम लेवेल तक धांग आते हैं ! ———————“नीक लगत” नीक लगल ! टॆक्निकली एके “कोड स्विचिंग’ कहल जाला ! रऊआ त एम्मे माहिर बाणं ! खाली जवन बोलिया क सब्दवा यूज भयल हऊंवय ओके “कोड मिक्सिंग” कहल जाला ! एसे भासा क सम्परेशीणता बढ़ जाले , जईसन की आप देखते हऊंअ , कई लोग पढ पढ के उप्पर किलकारी मरले हऊंअय !

  8. गिरिजेश जी आपने नायिका के रूप सौंदर्य का जिस बारीकी से वर्णन किया उससे बिहारी की नायिका याद आई .रूप और अदाओं से लबालब भरी सुंदर, मोहक ,तन्वन्गी कविता है .

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