नरक के रस्ते – 2

निवेदन और नरक के रस्ते -1  से जारी..
बुखार? सुख??



37 डिग्री बुखार माने जीवन
तेज बुखार माने और अधिक जीवन
इतना जीवन कि जिन्दगी ही बवाल हो जाए !
यह जीवन मेरे उपर इतना मेहरबान क्यों है?
ooo
बुखार चढ़ रहा है
अजीब सुखानुभूति।
पत्नी से बोलता हूँ –
भला बुखार में भी सुख होता है ?
बड़बड़ाहट समझ चादर उढ़ा
हो जाती है कमरे से बाहर।
ooo
कमरे में एकांत
कोई बताओ – भोर है कि सुबह?
….नानुशोचंति पंडिता:“
कौन इस समय पिताजी के स्वर गा रहा?
क्यों नहीं गा सकता ? सुबह है।
 कमरे में घुस आई है
धूप की एक गोल खिड़की ।
कमाल है आग कहाँ गई?
धूप सचमुच या बहम?
ooo
हँइचो हँइचो हैण्डपम्प
रँभाती गैया
चारा काटने चले मणि
कमरे के कोने में नाच रही मकड़ी
चींटियाँ चटक लड्डू पपड़ी
जै सियराम जंगी का रिक्शा
खड़ंजे पर खड़ खड़ खड़का।
धूँ पीं धूँ SSssS हों ssss
रामकोला की गन्ना मिल
राख उगलती गुल गिल
दे रही आवाज बाँधो रे साज
पिताजी चले नहाने
खड़ाऊँ खट पट खट टक
बजे पौने सात सरपट।
रसोई का स्टोव हनहनाया
सुबह है, कस्बा सनसनाया।
ooo
गोड़न गाली दे रही
बिटिया है उढ़री
काहें वापस घर आई?
बाप चुप्प है
सब ससुरी गप्प है।
बेटियाँ जब भागतीं
घर की नाक काटती
बेटा जब भागता
कमाई है लादता ।
ऐसा क्यों है?
गोड़न तेरी ही नहीं
सारी दुनिया की पोल है,
कि मत्था बकलोल है।
समस्या विकट है
सोच संक्कट्ट है।
ooo
बुखार का जोर है ।
हरापन उतर आया है कमरे में।
कप के काढ़े से निकल हरियाली
सीलिंग को रंग रही तुलसी बावरी।
छत की ओस कालिख पोत रही
हवा में हरियाली है
नालियों में जमी काई
काली हरियाली ..
अचानक शुरू हुई डोमगाउज
माँ बहन बेटी सब दिए समेट
जीभ के पत्ते गाली लपेट
विवाद की पकौड़ी
तल रही नंगी हो 
चौराहे पर चौकड़ी।
रोज की रपट   
शिव बाबू की डपट
से बन्द है होती
लेकिन ये नाली उफननी
बन्द क्यों नहीं होती?
ooo
टाउन एरिया वाले चोर हैं
कि मोहल्ले वाले चोर हैं ?
ले दे के बात वहीं है अटकती
ये नाली बन्द क्यों नहीं होती?
ooo
रोज का टंटा
कितने सुदामा हो गए संकटा।
वह क्या है जो नाली की मरम्मत नहीं होने देता?
इस उफनती नाली में पलते हैं बजबजाते कीड़े
और घरों के कुम्भीपाक 
खौलता तेल आग
ठंढा काई भरा पानी हरियाला  
अजब है घोटाला
कौन हुआ मालामाल है ?
ooo
 धूँ पीं धूँ SSssS हों ssss
ओं sss होंsss कीं हें sss
साढ़े नौ – पंजाब मिल की डबलदार सीटी|
जंगी का रिक्शा फिर खड़का है
अबकी दारू का नशा नहीं भड़का है।
पीढ़े से डकारते पिताजी उठते हैं ।
बगल के घर से हँसी गुप्ता की
तकिए की जगह नोट रखता है
जाने बैंक जाते इतना खुश क्यों रहता है ?
गुड्डू की डेढ़ फीट पीठ पर
आठ किलो का बस्ता चढ़ता है।
इस साढ़े नौ की सीटी से
पूरा कस्बा सिहरता है।
ooo
कैसी इस कस्बे की सुबहे जिन्दगी !
इतने में ही सिमट गई !! (जारी) 

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11 thoughts on “नरक के रस्ते – 2

  1. आपके सामने तो सब समानांतर घटा/घट रहा होगा पर कविता पढ़ते हुए तेजी से दृश्य फ्लैस के माफिक आ रहे थे…रोजमर्रा हम एक विषम गति से दौड़ रहे होते हैं, जब कभी ठहरना पड़ता है तो हर सापेक्षिक की गति स्लो मोशन में सूझ पड़ती है…फिर घटता है..टिक-टिक,कल-कल क्षण का घटना..अविरल परिवर्तन का निरखना, हर हलचल की आहात महसूसना….कुछ ऐसा ही ना राव जी…और अभी तो यह कालगति -सूंघना जारी है..

  2. बहुत कुछ परिवर्तित होते लैण्डस्केप्स की तरह झट-झटपट सम्मुख आता, निकलता, फिर आता ! प्रयुक्तियाँ सिखाओ भईया ! निपट अनाड़ी विनत सिर ! ठहर गया यहाँ-यहाँ – ’हँइचो हँइचो हैण्डपम्प’, ’राख उगलती गुल गिल’,"रसोई का स्टोव हनहनाया /सुबह है, कस्बा सनसनाया’,’धूँ पीं धूँ SSssS हों ssss /ओं sss होंsss कीं हें sss/ साढ़े नौ – पंजाब मिल की डबलदार सीटी’क्या-क्या ? कितना-कितना चुनूँ !

  3. …"तेज बुखार माने और अधिक जीवनइतना जीवन कि जिन्दगी ही बवाल हो जाए !यह जीवन मेरे उपर इतना मेहरबान क्यों है?"गिरिजेश जी,हम पर भी यह बुखार चढ़ा दिये आप तो…साधुवाद!

  4. आपको मैं किसी सीमा में नहीं बाँध रहा…….किंतु कविता में कस्बे के इतने सजीव वर्णन से नागर के लखनऊ और इलाहाबाद नजरों के सामने आ गए……..मजा आई गवा भैया……..आपका लेखन नि:संदेह स्तुत्य है!सादर नमन!!!!

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