अड़बड़िया कड़बड़

गहन चलो
काला पहन चलो
मन चलो
  उजले कफन चलो।



धंसती है लीक 
बहके कदम चलो 
रस्ते पे वे
पटरी सहम चलो
हँसते हैं गाल
आँखों बहम चलो।

ऊँची उनकी नाक 
रस्ते नमन चलो

पूछे हैं वो
हाले कहन चलो
करनी है बात
जीभे कटन चलो
ना सुनें जो वो
चुपके निकल चलो।

दूरी है क्या 
पाथे बिखर चलो

देखे हैं वे
अन्धे !ठहर चलो
न तलवे जमीन
चप्पल पहन चलो।

गोल गोल दिखते 
नज़रें उठन चलो

सिकोड़ी जो नाक
नजरें झुकन चलो
पापी दिमाग
कोंचे बहम चलो।

adbadiya
शरम का बहम
दिखता अहम चलो
काला पहन चलो
मनचलों !
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12 thoughts on “अड़बड़िया कड़बड़

  1. हे भईया यी कौनो नवकवा पिंगल क कविता है का मगर बहुत नीमन लागत बा हो -सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे,अर्थ अमित अति आखर थोरे निज मुख मुकुर मुकुर निज पानी गहि न जाई अस अद्भुत बानी शरद कोकास जी आईये अब समालोचना के लिए !

  2. लो आ गये .. भैया ..ये सब प्रयाण गीत हैं और कहीं आव्हान है कही आदेश है और कही निवेदन है जैसे..गहन चलो – यह गहराई तक जाने के लियेकाला पहन चलो – यह विरोध के लियेमन चलो -यह मन के लिये आदेश है उजले कफन चलो -यह मुक्ति के लिये बस इसी तर्ह इन कविताओ मे डूबिये और मतलब निकाल लीजिये .. मै भी अब चला ..तुम भी चलो..

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