पुरानी डायरी से -4 : काम कविता

13 दिसम्बर 1993, समय: ________                               ‘____ के लिए’ 
  

कभी कभी सोचता हूँ
कितना सुन्दर होगा तुम्हारा शरीर !
जिसका प्रगाढ़ आलिंगन करते हैं तुम्हारे वस्त्र 
और बातें करते हैं तुम्हारे अंग अंग से 
(मुझे ईर्ष्या होती है !)
कैसा होगा वह शरीर !


तुलसी के पत्ते पर
प्रात:काल में चमकती 
जुड़वा ओस की बूँदे
धवल पीन युगल वे स्तन
क्या वैसे ही होंगे ?


सुदूर फैला सपाट मैदान
सूना सा शांत सौन्दर्य 
क्षितिज पर कहीं पोखरे का आभास।
तुम्हारा नाभिस्थल ऐसा ही होगा।


हिमश्वेत उन्नत श्रृंगों के बीच 
बहती विद्रोही पहाड़ी नदी
परिपूर्ण यौवन वेगमय प्रवाह।
हाँ ऐसा ही होगा तुम्हारा जघन स्थल।
….
कभी कभी सोचता हूँ

कितना सुन्दर होगा तुम्हारा शरीर !
जिसका प्रगाढ़ आलिंगन करते हैं तुम्हारे वस्त्र ।
कभी कभी मैं सोचता हूँ। 
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8 thoughts on “पुरानी डायरी से -4 : काम कविता

  1. पढ़ कर लगा सौन्दर्य लहरी का आधुनिक अवतार हो गया है । बोल्ड एण्ड ब्यूटीफुल ! अदभुत !एक बात कहूँ – यह पवित्र-सौन्दर्य अवगाहन इतना संक्षिप्त क्यों? एक और बात रिझा गयी ! हर अंग की उपमा नयी- ओस की बूँदें, पोखरा, प्रवहनशील नदी – सब कुछ तरल, पारदर्शी, जल युक्त !

  2. जोर से कहने का मन कर रहा है 'जियो ! जियो रे मेरे लंठ!' क्या लाइनें लिख दी है. उम्र क्या थी तब ? मन की बातें तो सब खोल के धर दिए थे तब ही. गनीमत है संभाल के रखा है.

  3. कभी कभी सोचता हूँकितना सुन्दर होगा तुम्हारा शरीर ! जिसका प्रगाढ़ आलिंगन करते हैं तुम्हारे वस्त्र । कभी कभी मैं सोचता हूँ। wah kya baat hai wakai bahut sunder bahut achalaga padhker

  4. भाई गिरिजेश जी ,आज आपका ब्लॉग देखा ,शानदार कवितायेँ लिखते हो आप ,आनंद आगया ,बहुत देर से आपके पास आया ,अफ़सोस है/देर आये ,दुरुस्त आये मान कर संतोष करना है /मेरी बहुत बहुत शुभ कामनाएं /सादर ,डॉ.भूपेन्द्र

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