पुरानी डायरी से – 2

…. अपनी पुरानी डायरी आप के सामने खोलना प्रारम्भ कर रहा हूँ – पन्ने दर पन्ने , बेतरतीब । डायरी रोजनामचा टाइप नहीं बल्कि सँभाल कर छिपा कर किए प्रेम की तरह – जब मन आया लिख दिए, जब मन आया चूमने चल दिए, बहाने चाहे जो बनाने पड़ें। 
नई जवानी में बचपना अभी शेष है लेकिन आश सी है कि इन पन्नों को भी उतना ही प्यार दुलार मिलेगा।
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इसके पहले पुरानी डायरी से – 1


6 अप्रैल 1993, समय: रात्रि 1110                                ‘नश्वर’

हाँ यह शरीर नश्वर !
पूजित पहचान अमर
हाँ यह शरीर नश्वर।


स्वागत तिरस्कार
सौन्दर्य अभिसार
जीवंत काम अध्वर
हाँ यह शरीर नश्वर।


नीड़ का निर्माण
वेदना निर्वाण
उद्घोष प्राण सस्वर
हाँ यह शरीर नश्वर।

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13 thoughts on “पुरानी डायरी से – 2

  1. @ निशांतबारीक नज़र डालने के लिए धन्यवाद। नम्बरों की अच्छी कही। मिला कर देखिए न ;)असल में मैं कविताओं को पहले ऐसे ही रच डालता था। फिर सजा कर डायरी में उतारता था। साथ में समय भी डालता था। एक पेज पर अगर दो कविताएँ रहतीं तो दो रंगों की स्याही से उतारता और पृष्ठ के अंत में उन्हीं रंगों से समय लिखता जैसे – 9304051845 का अर्थ हुआ कि कविता सन 93 के चौथे माह की पाँचवी तिथि को शाम छ: बज कर पैंतालिस मिनट पर रची गई….एक अस्थाई सनक ही थी क्यों कि बाद में ऐसी कविताएँ भी रचीं जो लगातार दस वर्षों तक चलती रहीं….आशा है अब तक आप नम्बर मिला चुके होंगे। कोई प्रशंसिका मिली हो तो अवश्य बताइएगा 🙂

  2. अच्छा हुआ नम्बरो को लेकर उठने वाले सवालो का जवाब दे दिया,वरना हम भी रचना की खूबसूरती छोड़ नम्बरो की धुंद मे ही कुछ न कुछ खोजते नज़र आते।

  3. यहां अलग, वहां अलग…ड़ायरी तो एक ही है ना, या अलग-अलग…गीत तो ज़्यादा नहीं पचा…थोड़ा ज़्यादा ही अमूर्त हो गया इसलिए…या फिर इस शब्दावली से ज़्यादा परिचय नहीं है इसलिए…इसकी व्याख्या भी दें ना…यह परिपाटी भी एक नई शुरूआत होगी…पर समय लिखने की अदा भा गई…

  4. डायरी एक ही है – नम्बरों से खिलवाड़ की पुरानी आदत है सो सोचा कि सम संख्या वाले पोस्ट इस ब्लॉग पर और विषम संख्या वाले पोस्ट इस ब्लॉग पर | आप ने वर्ड प्रेस वाले पर टिपियाया जिसे मैं एक बैक अप के तौर पर रखता हूँ। आज कल बहुत कोशिशों के बावजूद सारे पोस्ट इम्पोर्ट नहीं करता। कोई कोडिंग एरर है। इसलिए आप एक आलसी का चिठ्ठा देखा करें।जब समय इस तरह से लिखता था तो सोचा भी नहीं था कि एक जमाना ऐसा आएगा कि टेलीफोन न्म्बर दस अंकों के होंगे और सीरीज 9 से प्रारम्भ होगी। ग़जब का संयोग है।यह गीत है क्या? मुझे नहीं पता क्यों कि संगीत का ज्ञान नहीं है। अमूर्त ? सीधे सीधे उन लोगों को ललकारा गया है जो सारे काम तो शरीर से करते हैं लेकिन उसे नश्वर बता कर फिलॉसफी झाड़ते हैं। अरे, फिलॉसफी झाड़ने के लिए भी तो शरीर चाहिए। प्रेत थोड़े दर्शन पढ़ते पढ़ाते हैं ! प्रयुक्त शब्द बड़े सुन्दर हैं। एक बार उनके अर्थ शब्दकोश से देखें – संस्कृत हो तो बहुत अच्छा। जाने कितने अर्थ उपजेंगे और आनन्द आएगा।व्याख्या । अरे कवि ससुरा अपनी रचना की व्याख्या करने लगे तो कवि कैसा? कविता तो ऐसी होनी चाहिए कि लोग अर्थ समझते सिर खुजाते खुजाते घाव कर लें 😉

  5. भाई जी,हालांकि एकाध शब्द का मतलब समझ में जरूर नहीं आया था…परंतु यह भाव जो आपने लिखा है, जरूर पहुंच गया था…पर यह भाव सामान्यतया उस रचना से सहज रूप से बाहर नहीं आ रहा था..ऐसा लग रहा था कि इस महत्वपूर्ण कविता को लोग रामचरितमानस की भांति..सिर्फ़ बाचेंगे और बहुत सुंदर…वाह,वाह…बगैरा…यही हो भी रहा है…मेरी कविताओं पर आपकी कई टिप्पणियों पर जवाब नहीं दिया…ऐसा लगता था, इशारों ही इशारों में बात हो रही है…एक दूसरे को असली मंतव्य समझ आ रहे हैं…ऐसे में क्या खुल कर बात की जाए…चलिए,आज अच्छा लगा…शब्दों के अर्थ देखकर और आनंद पाने की जुगत भिड़ाता हूं…शुक्रिया…

  6. राव साहब ..सच कहूँ .. आपके ख़त बहुत अच्छे है और कहते हैं कि जिसकी लिखावट अच्छी होती है उसका दिल बहुत अच्छा होता है । मन तो कर रहा है कि इस दिल से तार जोड़ने के लिये एक पोस्ट्कार्ड आप्को लिख दूँ लेकिन आपका पता मेरे पास नही है । और हाँ .. इस लिखावट के पीछे भी जो है छिपा कर किया गया ..वह मैने पढ़ लिया है अब यहाँ पब्लिकली उजागर न करूँ तो अच्छा है.. अकेले में बात करेंगे ।

  7. यह कविता अच्छी लगी..और ख़ास कर दिनांक लिखने का यह तरीका पसंद आया…इसे मैं भी साथ लिए जा रही हूँ..आप की लिखायी सुन्दर है…is tarah कविता की प्रस्तुति आप को सीधा लेखक से जोड़ देती है.

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