मुझसे पहली सी मुहब्ब्त . . . (भाग 1)

रात का समय. एक किशोर बी बी सी हिन्दी सेवा की रात्रि कालीन सभा सुन रहा है. मादक स्वर में एक नज़्म गूँजती है …मुझसे पहली सी मुहब्ब्त मेरी महबूब न माँग.
. . आठवीं (या नवीं) में पढ़ते किशोर को पहली बार यह अनुभव होता है कि प्यार क्या है ! या यूँ कहें कि क्या हो सकता है !!
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वह किशोर मैं था. फ़ैज रचित यह नज़्म नूरजहाँ गा रहीं थी. मन में फॉंस सी चुभ गई. बहुत बर्षों के बाद मुबारक बेग़म के गाए गीत कभी तनहाइयों में यूँ हमारी याद आएगी . .. को सुनते ही पुरानी फाँस हिल सी गई. मैंने फ़ैज की नज्म और नूरजहाँ के स्वर में उसका ऑडियो तलाशना प्रारम्भ किया. दोनों मिल गए . नज्म प्रस्तुत है. ऑडियो आप स्वयं तलाश लें.

मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग
मैंने समझा था के: तू है तो दरख्शाँ है हयात1
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर2 का झगडा क्या है?
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को है सबात3
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है?
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निग़ूँ4  हो जाए
यूँ न: था मैं न फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दु:ख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत5 के सिवा
अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म6
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब7 में बुनवाए हुए
जा-ब-जा8 बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथडे हुए, ख़ून में नहलाए हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों9 से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे?
अब भी दिलकश10 है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे?
और भी दु:ख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत5 के सिवा
मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग .
नक़्श-ए-फ़रियादी भाग-2, 1941, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
(साभार: राजकमल पेपरबैक)

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1. सुखमय जीवन, 2. सांसारिक दु:ख, 3. ठहराव, 4. बदल जाना, 5. मिलन का आनन्द्, 6. क्रूरता का अँधकारमय जाल, 7. कीमती वस्त्र 8. जगह जगह, 9. बीमारियोँ की भठ्ठी , 10. आकर्षक
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इस नज़्म की गहराई को दो बातों से मैंने समझा है:

“तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है?” और भरपूर उर्दू में भी “ग़म” के बजाय “दु:ख” शब्द का प्रयोग.
अपनी समझ बाद में बताउँगा. फ़िलहाल आप अति अद्भुत नज्म का आनन्द लें. ….. जारी.

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